Posts

Image
                                                                     गूगल से साभार चित्र      मित्रों  सर्वप्रथम आपको ,आपके परिवार तथा आपके सहपाठियों को पाँच पर्वों के त्यौहार दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ।      श्री गणेश जी ,श्री महालक्ष्मी जी ,श्री महा सरस्वती जी ,श्री महाकाली जी ,श्री कुबेर जी ,श्री धन्वन्तरि जी एवं श्री कृष्ण जी आपके व आपके परिवार में मंगलमय एवं समृद्धिपूर्ण परिवर्तन लाए, यही हमारी आदिशक्ति एवं देवताओं से प्रार्थना है।        सुखमय जीवन का अर्थ केवल धन ही नहीं है। मनुष्य का सर्वप्रथम निरोगी होना अनिवार्य है। अगर हम निरोगी हैं तभी हम उत्तम रूप से धन अर्जित कर सकते हैं। इसलिए दीपावली के पर्व की शुरूआत धनतेरस के दिन अर्थात धन्वन्तरि देव की पूजा से आरम्भ होती है। जो कि आयुर्वेद के जनक थे।      ...
Image
                                                 गूगल से साभार चित्र                     व्यास जी कहते हैं - राजन ! देवताओं की बात सुनकर इंद्र चिंतित हो गए और उन्होंने गुरु बृहस्पति जी को बुलाकर उनसे मंत्रणा शुरू की।         इंद्र ने कहा-  आप  सर्वज्ञ हैं। आप बुद्धिमान शास्त्र के तत्व को जानने वाले तथा देवताओं के गुरु हैं।  विधियों के ज्ञाता ब्राह्मण हैं।  आप शत्रुक्षय करने वाली कोई शांति करने की कृपा करें। जिससे मुझे दुःख न देखना पड़े।       बृहस्पति जी बोले - देवराज ! मैं क्या करूँ ? इस समय तुम्हारे द्वारा घोर निन्दित कार्य हो गया।  निरपराधी  मुनि को मारकर क्यों इस बुरे फल के भागी बन गए। दूसरों को पीड़ा देने वाला स्वयं सुखी रहे यह असम्भव है। तुमने मोह ओर लोभ में पड़कर ब्रह्म हत्या कर डाली। सम्पूर्ण देवता भी मिलकर...
Image
                                                गूगल से साभार चित्र           तदनन्तर त्रिशिरा का वध करके इंद्र अपने भवन की ओर चल दिए। वह मुनि महान आत्मा व तप का भंडार था। इंद्र के द्वारा मारे जाने के पश्चात् भी ऐसा प्रकाशमान हो रहा था मनो जीवित हो। यह देखकर इंद्र मन ही मन सोचने लगा कि यह मुनि जीवित न हो जाये। उस समय उसके सामने तक्षा नामक एक व्यक्ति खड़ा था। इंद्र ने उससे कहा - तक्षा ! तुम इस तेजस्वी मुनि के मस्तक को धड़ से अलग कर दो। इंद्र की बात सुनकर तक्षा ने कहा - इस मुनि का कन्धा बड़ा विशाल प्रतीत हो रहा है। मेरी कुल्हाड़ी उसे मार न सकेगी। तुमने यह अत्यंत निंदनीय कार्य किया है।  जो मारा हुआ है उसे पुनः मारने में केवल पाप का भागी ही होना पड़ता है।  मैं इस पाप से डरता हूँ।  वह मुनि तो मर ही गया ,फिर इसका सिर काटने से क्या परियोजन।          इंद्र ने कहा - इस पाप को दूर करने के लिए मैं प्रायश...
Image
                                         गूगल से साभर चित्र                                               एक  समय राजा जन्मेजय ने ऋषि व्यास जी से पूछा  कि मुनि इंद्र ने वृत्रासुर को मारा यह एक प्राचीन कथा है। फिर उस दैत्य को देवी ने कैसे मारा ? और किस कारण से इस कार्य में देवी प्रकट हुयी। ऋषिवर एक ही वृत्रासुर के दो विनाशक कैसे हो सकते हैं ? कृपया इस प्रसंग को विस्तार से सुनाएँ।      व्यास जी कहते हैं राजन !एक बार  वृत्रासुर और इंद्र का युद्ध हुआ था। वृत्रासुर को शत्रु मानकर इंद्र ने मार डाला।  इससे उन्हें महान दुःख उठाने पड़े।  इंद्र ने उन्हें कपट भेष धारण कर मारा था।  इसमें कोई आश्चर्य नहीं। क्यूंकि महामाया के प्रभाव से मुनियों की भी बुद्धि  भ्र्ष्ट हो जाती है। सत्यमूर्ति भगवान विष्णु अपनी माया ...
Image
                                                     गूगल से साभार चित्र        मैं भुवनेश्वरी देवी का ध्यान करता हूँ। उनके श्री अंगों की आभा प्रभात काल के सूर्य के सामान हैं और मस्तक पर चन्द्रमा का मुकुट है और उभरे हुए स्तनों और तीन नेत्रों से युक्त हैं। उनके मुख पर मुस्कान की छटा छायी रहती हैं और हाथों में वरद ,अंकुश, पाश एवं अभय मुद्रा शोभा पाते   है।        ऋषि कहते हैं - देवी के द्वारा वहाँ महादैत्यपति शुम्भ के मारे जाने पर इंद्र आदि देवता अग्नि को आगे करके उन कात्यायनी देवी की स्तुति करने लगे।  उस समय अभीष्टि की प्राप्ति होने से उनके मुख कमल दमक उठे थे।  और उनके  प्रकाश से दिशायें भी जगमगा उठी।        देवता बोले शरणगत की पीड़ा दूर करने वाली  देवी ! हम पर प्रसन्न हो ।  सम्पूर्ण जगत की माता प्रसन्न हो! विश्वेश्वरी! विश्व की रक्षा ...
Image
                                                गूगल से साभार चित्र           दशरथ पुत्र राम का विजयादशमी के दिन महाबली ,वेदज्ञ, ब्राह्मण रावण का वध करने का कारण विशेष है।               भगवान श्री राम का जन्म तो महाबली राक्षसराज रावण  ,मेघनाथ ,कुम्भकरण एवं अनेक राक्षसों के नाश के लिए ही हुआ था। वे भगवान विष्णु के अवतार थे। वह ख़ुशी - ख़ुशी अपनी पत्नी सीता एवं भाई लक्ष्मण के साथ वन को चले गए।           वन में रावण की बहन सूपनखा नाम की राक्षसी भगवान राम के रूप पर मोहित हो गयी और भेष बदल कर प्रभु राम के पास गयी। परन्तु एक स्त्री व्रतधारी प्रभु राम ने उसकी नाक काटकर उसे वापस भेज दिया।  इस बात से कुपित होकर उसके भाई रावण ने छल से माता सीता का अपहरण कर लिया। सब ओर पता करने पर भी राम  को सीता का कुछ पता नहीं चला ,तब प्रभु राम ने अपने भाई लक्ष्मण ...
Image
                                                  गूगल से साभार चित्र            दुर्गा सप्तसती के अनुसार राजा सुरथ ने  अपने मंत्रियों के द्वारा राज्य छीन लिए जाने के कारण जंगल में मेघा ऋषि के आश्रम में शरण ली और वैश्य समाधि के अपने पुत्रों एवं अपनी पत्नी के द्वारा घर से निकले जाने से मेघा ऋषि के आश्रम में पहुंचने पर एक दूसरे से परिचय प्राप्त किया। अपने दुःख को मेघा ऋषि के सामने व्यक्त करने पर ऋषि द्वारा उन्हें बताया गया की यह सब माया भगवती आदिशक्ति की लीला है। इस पर उन दोनों द्वारा आदिशक्ति के चरित्र के विषय में पूछे जाने पर मेघा ऋषि ने उन्हें भगवती आदि शक्ति माँ दुर्गा के विभिन्न रूपों की महिमा का गुणगान करते हुए दैत्यराज महिषासुर के वध के विषय में सुनते हुए कहा -                   जगदम्बा के श्री अंगों की कांति उदय काल के सहस्त्रों सूर्यों के समन है।  व...