Posts

Image
              राजा शर्याति जब चिंता के सागर में डूबे हुए थे ,उसी समय सुकन्या ने चिंता से आकुल अपने पिता को संयोग वश देख लिया। उन्हें देखते ही प्रेम से परिपूर्ण हृदय वाली वह सुकन्या अपने पिता राजा शर्याति के पास गयी और वहां जाकर उनसे पूछने लगी। हे राजन ! कमल के समान नेत्र वाले बैठे हुए इन युवा मुनि को देखकर चिंता के कारण व्याकुल मुखमण्डल आप इस समय क्या सोच रहे हैं ? हे पिताजी ! इधर आईये और मेरे पति को प्रणाम कीजिये। हे मनुवंशीय राजन ! इस समय आप शोक मत कीजिये।         तब अपनी पुत्री सुकन्या की बात सुनकर क्रोध से संतप्त राजा शर्याति अपने सामने खड़ी उस कन्या से कहने लगे - हे पुत्री ! परम तपस्वी वृद्ध तथा नेत्रहीन वे मुनि च्यवन कहाँ है ? ये मदोन्मत युवक कौन हैं ? इस विषय में मुझे महान  संदेह हो रहा है। दुराचार में लिप्त रहने वाली हे पापिनी ! हे कुलनाशिनी ! क्या तुमने च्यवन मुनि को मार डाला और काम के वसीभूत होकर इस पुरुष का नये पति के रूप में वरण कर लिया। इस आश्रम में रहने वाले उन मुनि को मैं इस समय नहीं देख रहा ...
Image
              अश्विनी कुमारों के द्वारा वर प्राप्त कर सुन्दर रूप ,नेत्र ,यौवन तथा अपनी भर्या को पा  कर च्यवन मुनि अत्यंत हर्षित हुए। उन महा तेजस्वी मुनि ने अश्विनी कुमारों से कहा - हे देववरो ! आप दोनों ने मेरा महान उपकार किया है। आप लोगों ने मुझे नेत्र ,युवावस्था तथा सुन्दर रूप प्रदान किया है। अतः मैं भी आपका कुछ उपकार करूँ। इसके लिए आपसे प्रार्थना कर रहा हूँ। हे देववरो ! जो मनुष्य उपकार करने वाले मित्र का किसी प्रकार का उपकार नहीं करता उस मनुष्य को धिक्कार है। ऐसा मनुष्य पृथ्वी लोक में अपने उपकारी मित्र का ऋणि होता है।        अतएव हे देववरो ! मुझे नूतन शरीर प्रदान करने के उपकार के बदले, मैं इस समय आपकी कोई अभिलषित वस्तु आपको प्रदान करना चाहता हूँ। मैं आप दोनों को वह अभीष्ट वस्तु प्रदान करूँगा जो देवताओं तथा दानवों के लिए भी अलभ्य है।अब आप लोग  अपना मनोरथ प्रकट करें।         च्यवन मुनि के वचन सुनकर वे दोनों अश्विनी कुमार मुनि से कहने लगे - हे मुने ! पिताजी की कृपा से हमारा स...
Image
    गूगल से साभार चित्र         सुकन्या ने च्यवन मुनि से जब अश्विनी कुमारों  के विषय में बताया, तब च्यवन मुनि बोले - हे कांते ! मेरी आज्ञा के अनुसार तुम देवताओं के श्रेष्ठ चिकित्सक अश्विनी कुमारों  के समीप जाओ और उन्हें  मेरे पास शीघ्र ले आओ। तुम उनकी शर्त तुरंत स्वीकार कर लो। इसमें कोई सोच - विचार नहीं करना चाहिए। इस प्रकार मुनि की आज्ञा पाकर वह अश्विनी कुमारों  के पास जाकर उनसे बोली - हे  श्रेष्ट अश्विनी कुमारों  आप लोग प्रतिज्ञा के अनुसार शीघ्र ही कार्य करें।       सुकन्या की बात सुनकर वह अश्विनी कुमार राजकुमारी से बोले - तुम्हारे पति इस सरोवर में प्रवेश करें। तब रूप प्राप्ति के लिए च्यवन मुनि शीघ्रता पूर्वक सरोवर में प्रविष्ट हो गए। उसके बाद दोनों अश्विनी कुमारों   ने भी उस सरोवर में प्रवेश किया। तदनन्तर वे तीनों तुरंत ही उस सरोवर से बाहर  निकल आये और एक समान युवा बन गए। शरीर के सभी अंग समान वाले वे तीनों युवा दिव्य कुण्डलों एवं आभूषणों से सुशोभित थे।   ...
Image
                                                             गूगल से साभार चित्रण        अश्विनी कुमारों ने सुकन्या की बात सुनकर उससे कहा - हे कल्याणी ! तुम्हारे पिता ने तुम्हें उन तपस्वी को कैसे सौंप दिया। तुम तो इतनी सुन्दर हो, की तुम्हें देवताओं के यहाँ होना चाहिए। इतनी सुन्दर स्त्रियाँ तो वहां भी  नहीं हैं। तुम्हें तो दिव्य वस्त्र और सुन्दर आभूषण धारण करने चाहिए।  इन वल्कल वस्त्रों में तुम  सोभा नहीं पा रही हो।        हे प्रिये ! विधाता ने यह कौन सा कृत्य किया है जो की तुम इस नेत्र हीन मुनि को पति रूप में प्राप्त करके इस वन में महान कष्ट भोग रही हो ? तुमने इन्हें व्यर्थ ही वरण किया। नवीन अवस्था प्राप्त करके  तुम इनके साथ सोभा नहीं पा रही हो।  भली - भांति लक्ष्य साध करके कामदेव के द्वारा वेग पूर्वक छोड़े  गए बाण किस पर गिरेंगे। तुम्हारे पति तो इस प्रका...
Image
                                                       गूगल से साभार चित्र                                          राजा शर्याति के महल वापस जाने के पश्चयात सुकन्या अपने पति च्यवन मुनि की सेवा   में संलग्न हो गयी। धर्मपरायण वह उस आश्रम में अग्नियों की सेवा में निरंतर रहने लगी। सर्वदा पति  सेवा में तत्पर रहने वाली वह बाला  विभित प्रकार के   स्वादिष्ट फल तथा कंदमूल लेकर मुनि को अर्पण करती थी।         वह शीतकाल में उष्ण जल से उन्हें शीघ्रता पूर्वक स्नान करने के पश्चयात मृगचर्म पहनकर पवित्र आसान पर विराजमान कर देती थी। पुनः उनके आगे तिल ,जौ ,कुशा और कमंडल रखकर उनसे कहती थी मुनि श्रेष्ट अब आप अपना नित्य कर्म करें। उसके पश्चयात सुकन्या पति का हाथ पकड़कर उठती और पुनः किसी आसान अथवा...
Image
             राजा शर्याति एवं उनके मंत्रीगण इस शंकट पर कोई निर्णय नहीं ले सके तब अपने पिता तथा मंत्रियों को चिंता से व्याकुल देखकर सुकन्या उनका अभिप्राय समझ गयी और मुस्कराकर बोली -हे पिता जी ! आज आप चिंता से व्याकुल इन्द्रियों वाले किसलिये है ? निश्चित ही आप मेरे लिए ही अत्यंत दुःखी तथा म्लानमुख  है। अतएव हे पिताजी ! मैं अभी भयाक्रांत मुनि च्यवन के पास जाकर और उन्हें आश्वस्त करके अपने को अर्पितकर प्रसन्न करुँगी।        इस प्रकार सुकन्या ने जो बात कही उसे सुनकर प्रसन्न मन वाले राजा शर्याति ने सचिवों के समक्ष उससे कहा - हे पुत्री ! तुम अबला हो।  अतएव वृद्धता से त्रस्त उस अंधे तथा विशेष रूप से क्रोधी मुनि की सेवा उस वन में कैसे करोगी ? हे पुत्री ! कहाँ तो तुम ऐसी रूपवती और कहाँ वन में रहने वाला वह वृद्ध मुनि ऐसी स्थिति में ,मैं अपनी पुत्री को उस अयोग्य को भला कैसे अर्पित करू ?       हे पुत्री मेरा राज्य और यहाँ तक की मेरा शरीर भी रहे अथवा चला जाये ,किन्तु मैं उस नेत्रहीन मुनि को  तुम्ह...
Image
                                                 गूगल से साभार चित्र          राजा शर्याति के सैनिकों के मलमूत्र के अवरोध की बात उन्हें ज्ञात हुयी तब राजा ने इस कष्ट को दूर करने पर विचार किया। कुछ समय सोचने के पश्चयात घर पर आकर अपने परिजनों तथा सैनिकों से अत्यंत व्याकुल हो  पूछने लगे - किसके द्वारा यह नीच कार्य किया गया है ? इस सरोवर के पश्चिमी तट पर वन में महान  तपस्वी च्यवन मुनि कठिन तपस्या कर रहे हैं। अग्नि के समान तेज वाले उन तपस्वी के प्रति किसी ने कोई अपकार अवश्य ही किया है। इसलिए हम सबको   ऐसा कष्ट हुआ है। महा तपस्वी ,वृद्ध एवं श्रेष्ट महात्मा च्यवन का अवश्य ही किसी ने अनिष्ट कर दिया है। यह अनिष्ट जान बूझकर किया गया या अनजाने में इसका फल तो भोगना ही पड़ेगा।         इस घटना से चिंतित राजा शर्याति ने सब लोगों से पूछने के पश्चयात अपने बंधुओं से भी पूछा। समस्त प्रजा जन और अपने ...