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                                                                                                 गूगल से साभार चित्र                                                         कुछ समय बीतने पर महाराज आखेट के लिए वन में गए। वहाँ अनेक प्रकार के मृगों भैंसों तथा सूकरों को अपने वाणों से मारते हुए वे गंगाजी के तटपर जा पहुँचे। उस नदी में बहुत थोड़ा जल देखकर वे राजा शान्तनु बड़े आश्चर्य में पड़ गए।             उन्होंने वहाँ नदी के किनारे खेलते हुए एक बालक को महान धनुष को खींचकर बहुत से बाणों को छोड़ते हुए देखा उसे देखकर राजा शांतनु बड़े विस्मित हुए और कुछ भी न जा...
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                                             मित्रों हर धर्म एवं हर समाज    में माता पिता को ईश्वर से  ऊँचा स्थान दिया जाता है ,क्योंकि हमें इस संसार मैं मनुष्य योनि  हमारे माता पिता द्वारा ही प्राप्त होती है। इसलिए हम  अपने माता पिता का यह कर्ज कभी भी नहीं उतार सकते। अगर हम अपने मा.तापिता की खुशी के लिए कोइ कार्य कर सकें जिसमें हमारी सारी खुशियां कुर्बान हों तो भी हमें अपने ऊपर  गर्व होना चाहिए। आज जो कथानक आरंभ हो रहा है उसमें एक पुत्र का अपने पिता की खुशी के लिए किया गया बलिदान इतिहास के पन्नों पर लिख दिया गया।         मित्रों उस नायक का नाम आप आगे खुद जान लेगें इसलिए इस कथानक को पढ़ते रहिये        सूतजी बोले प्रतीप के स्वर्ग चले जाने पर सत्यपराक्रमी राजा  सांतनु व्याघ्र तथा मृगों को मारते हुए मृगया में तत्पर हो गए किसी समय गंगा के किनारे घने वन में विचरण करते हुए रा...
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                                                         गूगल से साभार चित्र           श्री नारायण बोले -हे नारद !अब आप जगदम्बा का अदभुत तथा उत्तम माहात्म्य और अंग के पुत्र मनु ने जिस तरह से श्रेष्ठ राज्य प्राप्त किया था उसे सुनिए              राजा अंग के उत्तम पुत्र चाक्षुष छठें मनु हुए वे सुपुलेह नामक ब्रह्मर्षि की शरण में गए। उनहोंने ऋषि से कहा -शरणागतों की कष्टों को दूर करने वाले हे ब्रह्मर्षि !मैं आपकी शरण में आया हूँ। हे स्वामिन !मुझ सेवक को ऐसी शिक्षा दीजिये जिससे मैं श्री प्राप्त कर सकूं ,पृथ्वी पर मेरा आकण्ठ अधिपत्य हो जाए ,मेरी भुजाओं में अधिक बल आ जाए तथा अस्त्र -शस्त्र के प्रयोग में निपुण तथा समर्थ हो जाऊं ,मेरी संतानें चिरकाल तक जीवित रहें ,मैं उत्तम आयु वाला हो जाऊं तथा आपके उपदेश से अंत में मुझे मोक्ष लाभ हो जाए          ...
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                                                                                                     गूगल से साभार चित्र श्री नारायण बोले -(हे नारद ) राजा वैवस्वत सातवें मनु कहे गए हैं। समस्त राजाओं में मान्य तथा दिव्य आनंद का भोग करने वाले वे श्राद्धदेव भी कहे जाते हैं वे वैवस्वत मनु पराम्बा भगवती की तपस्या करके उनके अनुग्रह से मनवन्तर के अधिपति बन गए            आठवें मनु भूलोक में सावर्णि नाम से विख्यात हुए पूर्व जन्म में देवी की आराधना करके तथा उनसे वरदान प्राप्त कर वे मनवन्तर के अधिपति हो गए। वे सभी राजाओं से पूजित ,धीर ,महापराक्रमी तथा देवी भक्तिपरायण थे          नारदजी बोले -उन सावर्णि मनु ने पूर्वजन्म में भगवती की पार्थिव मूर्ती की किस प्रकार आराधना की थी ...
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       श्रेष्ठ वसु की पत्नी के द्वारा नंदिनी गाय के विषय में पूछे जाने पर उनके पति ने कहा - हे सुंदरी! यह महर्षि वसिष्ठ जी की गाय है। इस गाय का दूध स्त्री या पुरुष जो कोई भी पीता  है उसकी आयु दस हजार वर्ष की हो जाती है। और उसका यौवन सर्वदा बना रहता है। यह सुकर उस सुंदरी स्त्री ने कहा - मृत्यु लोक में मेरी एक सखी है, वह राजर्षि उशीनर की परम सुंदरी कन्या है। उसके लिए अत्यंत सुन्दर तथा सब प्रकार की कामनाओं को देने वाली इस गाय को बछड़े सहित अपने आश्रम में ले चलिए। जब मेरी सखी इसका दूध पीयेगी तब वह निर्जरा एवं रोग रहित होकर मनुष्यों में एक मात्र अद्वितीय बन जाएगी। यह सुनकर उन श्रेष्ठ वसुओं ने मुनि का अपमान करके नंदिनी गाय का अपहरण कर लिया।        महा तपस्वी वसिष्ठ जी  ने जब अपने आश्रम में बछड़े सहित नंदिनी को नहीं देखा तब उन्होंने उसे वनों एवं गुफाओं में देखा। जब वह गाय नहीं मिली तब मुनि ने ध्यान योग से उसे वसुओं के द्वारा हरी गयी जानकर अत्यंत कुपित हुए। वसुओं ने मेरी अवमानना करके गाय चुरा ली है। वे सभी मानव यौनि में जन्म ग्रहण करेंगे। ...
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         मुनि के ऐसा कहने पर कि हे  सुंदरी ! इस कार्य में देवताओं का ही कोई कार्य छुपा हुआ है। इसी कारण मैं तुम्हारे ऊपर कामाशक्त हुआ हूँ। ऐसा कहकर अपने वश में आयी हुयी उस कन्या के साथ संसर्ग करके मुनि श्रेष्ठ पराशर तत्काल यमुना नदी में स्नान कर वह से शीघ्र चले गए। वह साध्वी मत्स्यगंधा  भी तत्काल गर्भवती हो गयी। यथा समय उसने यमुना जी के द्वीप में दूसरे कामदेव के तुल्य एक सुन्दर पुत्र को जन्म दिया।            उस पुत्र ने पैदा होते ही अपनी माता से कहा - हे माता ! मन में तपस्या का निश्चय करके ही अत्यंत तेजस्वी मैं गर्भ में प्रविष्ट हुआ था। हे माते ! अब आप अपनी इच्छा के अनुसार कहीं भी चली जाएँ और मैं भी यहाँ से तप करने के लिए जा रहा हूँ। हे माता ! आपके स्मरण करने पर ,मैं अवश्य ही दर्शन दूंगा। हे माता ! जब कोई उत्तम कार्य आ पड़े तब आप मुझे स्मरण कीजिये। मैं शीघ्र ही उपस्थित हो जाऊंगा। आप चिंता छोड़ सुखपूर्वक रहिये। मत्स्यगंधा ने ( सत्यवती ) बालक को यमुना जी में जन्म दिया था। अतः वह बालक " द्वैपायन " नाम से विख्यात हुआ। वि...
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     मछुआरे ने मछली के पेट से निकले उन दोनों रूपवान बालक तथा बालिका को राजा उपरिचर को सौंप दिया।  राजा भी आश्चर्यचकित हुआ और उसने उस सुन्दर पुत्र को ले लिया। जो आगे चलकर मत्स्य नामक राजा हुआ।          राजा उपरिचर वसु ने वह कन्या उस मछुआरे को ही दे दी। जो आगे चलकर मत्स्यगंधा नाम से कही जाने लगी। उस मछुआरे दास के घर वह सुंदरी धीरे - धीरे बड़ी होने लगी।          जब मुनि ने उस अप्सरा को श्राप दिया तब वह विस्मित हो गयी और दीनता पूर्वक रोती  हुयी उस ब्राह्मण से  प्रार्थना करने लगी - दयालु ब्राह्मण ने उस रोती  हुयी स्त्री से कहा - हे कल्याणी ! तुम शोक न करो मैं तुम्हारे श्राप के अंत का उपाय बताता हूँ। मैंने क्रुद्ध होकर जो श्राप दिया है उससे तुम मत्स्य यौनि को प्राप्त होगी। किन्तु तुम अपने उदर से एक युगल मानव संतान उत्पन्न कर उस श्राप से मुक्त  हो जाओगी।         उसके ऐसा कहने पर वह यमुना जल में मछली का शरीर पाकर तथा दो सन्तानो को उत्पन्न करके श्राप ...